एक ब्लॉग पढ़ रहा था...शीर्षक था ...(ये खून के रिश्ते ) और नाम था..दिल के दरमियां.. तो ..मेरे जहन में एक कविता ने जन्म लिया...
ये खून के रिश्ते दिल के दरमियां आते तो होंगे॥
मुंडेर पे छत की बैठ कबूतर गाते तो होंगे..
वो ब्याह कराना गुड्डे का,वो हाथ रचाना गुड़िया का
चोर बन आंगन के कोने छुप-छुप जाना मुनिया का
मुंह चिढ़ाकर नन्हे को सिर खुजलाना मुनिया का
गुस्से में नन्हे का आना,झोटा हिलाना मुनिया का
बच्चे, तेरे जहन में बैठे, ऱुठते मनाते तो होंगें...
ये खून के रिश्ते दिल के दरमियां आते तो होंगे....
दरख्त के नीचे आंगन में झर झर कर झर आती वो धूप,
सांझ के दामन में छिपकर बांहो को सरकाती वो धूप
वो धूप तुम्हारे आंगन में अब भी यूं ही इठलाती है
गरम गरम बोसों से अपने,दिल को अब भी सहलाती है
उमड़ घुमड़ती यादों के पल,जहन में तेरे, आते तो होंगे
ये खून के रिश्ते दिल के दरमियां आते तो होंगे...........
Saturday, September 29, 2007
एक कविता----मुंडेर पे छत की बैठ कबूतर गाते तो होंगे..
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