Monday, July 6, 2015

एक दिन तो मुकम्मल मोहब्बत करो


एक दिन तो मुकम्मल मोहब्बत करो
 रफ्ता रफ्ता यूँ ज़िन्दगी गुज़र जायेगी   
शाम ठहरी है ठहरी रहेगी सनम
यूँ पत्थर न मारो बिखर जायगी      
एक दिन तो ....
प्रेम हृदय बने प्रेम नयन बने   
प्रेम प्रातः बने प्रेम शयन बने  
प्रेम नभ् से परे क्षितिज बने
प्रेम ही प्रेम हो भरा वहां दूर जहाँ तक तुम्हारी नज़र जायेगी   
एक दिन तो मुकम्मल ...
 प्रेम रस रिश्तों में हो इतना भरा  
एक का दर्द दूजा एहसासे ज़रा
हो अगर प्यार इतना समाया हुआ
सच मानो ये ज़िन्दगी संवर जायेगी        
एक दिन तो ....

Friday, June 12, 2015

अरमान

ग़मज़दा बैठा हूँ कि मेले भी हैं महफ़िल भी

ग़मज़दा बैठा हूँ कि मेले भी हैं महफ़िल भी

खड़ी वो सामने मेरे मंज़िल हँसा करती तो है

वक़्त था तो साथ मेरे सारा जहाँ आता था अब
शब भर मेरे साथ मेरी तन्हाइयां जगा करती तो हैं

Thursday, July 31, 2014

वो अपने जाने का सामान कर बैठे

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      वो अपने जाने का सामान कर बैठे
यूँ मेरी जिंदगी की शाम कर बैठे

कैसे कटेगा बेसब्र तन्हाई का आलम
कैसे कटेगा वक़्त. वो जुदाई का आलम
न दिन गुजरेगा न रात गुजरेगी                    
वो तन्हा शाम बेबात गुजरेगी

अपनी तम्मनाओ को देकर परवाज़
मेरी हसरतों को विराम  दे बैठे

       तसव्वुर उनके ख्यालात उनके
बातें उनकी वाक्यात उनके
गुज़र के गयी जो सबा उनकी थी
बहा ले गयी वो सदा उनकी थी

       खुद तो गये.वो  ,हम तनहा 'क्षितिज़'    
जिंदगी हमारी तमाम कर बैठे।

Saturday, March 22, 2014


सर्द रात में क़हर बन गया
वो लम्हा मेरी जीस्त का ज़हर बन गया
वो शाम का मंज़र
वो बेहया रात
वो बेखौफ़ निगाहे
बेसब्र जज्बात

फिर एक शाम गुज़री

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फिर एक दिन गया , फिर एक शाम गुज़री,
ज़िन्दगी बस यूँ ही तमाम गुज़री।
 तू नही, तेरी आरजू तेरी यादें ही सही
मेरी सांसो की हर शै बेआराम गुज़री
 तेरे तसव्वुर में बस थक गयीं आँखें
रात का हर लम्हा बे जाम गुज़रा

Saturday, September 29, 2007

एक कविता----मुंडेर पे छत की बैठ कबूतर गाते तो होंगे..

एक ब्लॉग पढ़ रहा था...शीर्षक था ...(ये खून के रिश्ते ) और नाम था..दिल के दरमियां.. तो ..मेरे जहन में एक कविता ने जन्म लिया...

ये खून के रिश्ते दिल के दरमियां आते तो होंगे॥
मुंडेर पे छत की बैठ कबूतर गाते तो होंगे..
वो ब्याह कराना गुड्डे का,वो हाथ रचाना गुड़िया का
चोर बन आंगन के कोने छुप-छुप जाना मुनिया का
मुंह चिढ़ाकर नन्हे को सिर खुजलाना मुनिया का
गुस्से में नन्हे का आना,झोटा हिलाना मुनिया का

बच्चे, तेरे जहन में बैठे, ऱुठते मनाते तो होंगें...

ये खून के रिश्ते दिल के दरमियां आते तो होंगे....

दरख्त के नीचे आंगन में झर झर कर झर आती वो धूप,
सांझ के दामन में छिपकर बांहो को सरकाती वो धूप
वो धूप तुम्हारे आंगन में अब भी यूं ही इठलाती है
गरम गरम बोसों से अपने,दिल को अब भी सहलाती है
उमड़ घुमड़ती यादों के पल,जहन में तेरे, आते तो होंगे
ये खून के रिश्ते दिल के दरमियां आते तो होंगे...........

Sunday, September 16, 2007

गालिब का एक शेर...........

बहुत दिनो के बाद आज आपसे मुखातिब हुये हैं......आज एक शेर...

गालिब का एक शेर याद आ रहा है.....................

हम कहां के दाना थे किस हुनर में यकता थे
बेसबब हुआ दुश्मन गालिब आसमां अपना।
हुई मुद्दत कि गालिब मर गया पर याद आता है
वो हरेक बात पर कहना कि,यूं होता तो क्या होता।

.......