Friday, April 6, 2007

ग़म-ए-जिंदगी--

ग़म-ए-जिंदगी के हमसफर आंसुओं,
बस छोटी सी एक बात बना दो,
संगदिल मेरे दिल को कर दो,
जज्बातों को फौलाद बना दो।
न सोचूं न चाहूं ना मुलाकात हो
न करवट ही बदलूं न कोई याद हो।
बिछड़े तो हमको गरज़ है क्या
झटक दूं दिल से गर फरियाद हो।
खुद से है शिकायत या कि खुदा से है

हुआ दिया भी बुझा बुझा सा है।
आईने को रखता हूं गर अपने रु-ब-रु।
आईने का शख्स भी मुझसे जुदा सा है।
वो राह में मिले तो नज़र अपनी बचा लूं,
वो ख्वाब में मिले तो नींदे उड़ा लूं,
याद भी आये तो आंख नम ना हो
गर चाह में मिले तो दिल को जला लूं।
अबतक मेरे यकीं को मिलता रहा है धोखा,
सैलाब आंसुओं का क्या आके किसी ने रोका
ना आवाज ही दी मुझको न किसी ने टोका
चलता गया मैं ऐसे जैसे हवा का झोंका।
तड़पते दिलों की हर ओर सदायें हैं
ग़मों से लिपटी बहती हवायें हैं
आवाज़ की कशिश का हर तार है टूटा
चमन में हर तरफ फूल मुरझाये हैं।
तड़प ए दिल कि आज रोना है तुझे
जख्म-ए-जिगर को आंसुओं से धोना है तुझे
हुई नाकाम हजा़रों जिंदगिया तो क्या
रु-ब-रु फिर नयी जिंदगी से होना है तुझे।

5 टिप्पणियाँ:

ranju said...

यह ज़िंदगी आसान नही है जीनी दोस्त
यह कभी सुलझाने वाला मसला नही है !!

बहुत ख़ूब लिखा है आपने ..पहली बार पढ़ा आपका लिखा हुआ अच्छा लगा

तड़प ए दिल कि आज रोना है तुझे
जख्म-ए-जिगर को आंसुओं से धोना है तुझे
हुई नाकाम हजा़रों जिंदगिया तो क्या
रु-ब-रु फिर नयी जिंदगी से होना है तुझे।

उडन तश्तरी said...

बढ़िया लिख रहे हो, लिखते रहो. बधाई.

masijeevi said...

अच्‍छी रचना

रीतेश गुप्ता said...

बहुत खूब...बधाई

सचिन said...

आप सबके द्वारा हौसलाअफजाई के लिये धन्यवाद...