tag:blogger.com,1999:blog-2838083744330842022.post-7160149295470677922007-04-15T01:03:00.000-07:002007-04-15T01:11:04.909-07:00सपने..जो अक्सर टूट जाया करते हैं......खामोश शाम के साथ -साथ<br />सपने भी चले आतें हैं।<br /> बिस्तर पर लेटते ही<br />घेर लेते हैं मुझे<br /> और नोचने लगते है अपने पैने नाखूनो से ..<br />जैसे चीटियों के झुंड में कोई मक्खी फंस गयी हो<br /> घर , कार, कम्प्यूटर, म्यूजिक सिस्टम, मोबाईल , महंगे कपड़े ,डांस पार्टी ,वगैरह -2<br />मक्खी के शरीर से खून टपकने लगता है..<br />एक एक सपना बूंद बनकर टपकने लगता<br />ये लिजलिजा खून.......<br />हर बूंद सपना नज़र आती है,<br />बूंद यानी मकान का किराया, राशन , बच्चों की फीस, बिचली , पानी का बिल, अखवार का बिल..........धोबी का बिल, सब्जियों की आसमान छूती कीमतें...<br />मैं हड़बड़ाकर उठ बैठता हूं.......सपना टूट जाता है....<div class="blogger-post-footer"><a href="http://www.akshargram.com/narad" target="_blank"><img src="http://www.jitu.info/images/narad.jpg" border="1" alt="NARAD:Hindi Blog Aggregator"/></a></div>बेचैन उत्साहीnoreply@blogger.com