tag:blogger.com,1999:blog-2838083744330842022.post-16116339873827323542007-03-31T13:21:00.001-07:002007-03-31T13:28:47.105-07:00मन.....मन<br /><br /> मन, खुले मैदान में, <br /> नव शावकों सा कुलांचे भरता, <br /> मन, कस्तूरी मृग की भांति <br /> अपनी ही नाभि से उत्पन्न,<br /> सुरभि की खोज में भटकता,<br /> मन, मस्तिष्क की देहरी लांघ, <br /> इच्छाओं के विराट समन्दर में गोते लगाता। <br /> मृत्यु के शाश्वत सत्य से भय क्यों खाता है मन, <br /> जानकर भी अंजान बने रहते हैं हम,<br /> सुमिरिनी की डोर पर कब किसका वश चला है।<br /> तो मन, धारित्री और गगन के आभासी मिलन<br /> पर मत इतरा, ये उतना ही झूठ है,<br /> जितना जीवन ।<div class="blogger-post-footer"><a href="http://www.akshargram.com/narad" target="_blank"><img src="http://www.jitu.info/images/narad.jpg" border="1" alt="NARAD:Hindi Blog Aggregator"/></a></div>बेचैन उत्साहीnoreply@blogger.com